जॉन एलिया एक बदनाम शायर जो खून थूकता था
जॉन एलिया भारत में जन्मे वो शायर थे जिन्हें विभाजन ने पाकिस्तान में ले जाकर रखा तो लेकिन वो ये दर्द कभी भुला नहीं पाए l जॉन एलिया अपने तेज अंदाज , रूहानी अल्फाजों और साहित्य के ज्ञान से सभी के दिलों में आज भी बने हुए है l जॉन साहब का जन्म 14 दिसम्बर 1931 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में हुआ l जॉन साहब अपने भाइयों में सबसे छोटे थे , पिता अल्लामा शफीक हसन एलिया खुद एक शायर थे और साथ ही ज्योतिषी भी रहे l जॉन साहब पर इनका असर पड़ा और शायरी तो जैसे इन्हें विरासत में मिली l

जॉन साहब ने अपना पहला शेर 8 वर्ष की उम्र में लिखा l अपनी लेखनी में तो वो अब्बल थे ही साथ ही पत्रकारिता के कार्यों में भी ये आगे रहे l उनकी कुछ प्रकाशित रचनाये रही :
शायद ( Shayad ) – 1991
यानी ( Yanee ) – 2003
गुमान ( Guman ) – 2004
लेकिन ( Lekin ) – 2006
गोया ( Goya ) – 2008
जॉन साहब कभी भी विभाजन के पक्षधर नहीं रहे वो हमेशा से ही इसका विरोध करते रहे , लेकिन बाद में इसे एक समझौते के रूप में स्वीकार किया l और ये दर्द उनकी शायरी में देखने को मिलता है l अपने लेखन में वो कई बार अमरोहा के बारे में जिक्र करते है , और उसका दर्द भी बयां करते है l
जॉन साहब का विवाह साहित्यिक पत्रिका इंशा के ही एक उर्दू लेखिका हिना से हुआ l लेकिन 1980 में तलाक हो गया l और इसी के चलते बाद में शराब की लत ने ऐसे जकड़ा की फिर निकल नहीं पाए और जॉन बीमारी से ग्रसित हो गए l
लम्बी बीमारी के चलते 8 नवम्बर 2002 में कराची में उनका निधन हो गया l हालाँकि उनकी शायरी को शायद उस वक़्त वो मुकाम नहीं हासिल हो सका लेकिन आज जॉन को पढने वालों की कमी नहीं है l वो लिखते भी है तो क्या खूब

मैं जो हूँ ‘जौन-एलिया’ हूँ जनाब
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा
बेदिली! क्या यूँ ही दिन गुजर जायेंगे
सिर्फ़ ज़िन्दा रहे हम तो मर जायेंगे
ये खराब आतियाने, खिरद बाख्ता
सुबह होते ही सब काम पर जायेंगे
कितने दिलकश हो तुम कितना दिलजूँ हूँ मैं
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे
वो है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते हैं
